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Rigveda / 6 / 45 / 31

अधि॑ बृ॒बुः प॑णी॒नां वर्षि॑ष्ठे मू॒र्धन्न॑स्थात्। उ॒रुः कक्षो॒ न गा॒ङ्ग्यः ॥३१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 45 | Mantra No : 31

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : बृबुस्तक्षा | छन्द : आर्च्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब व्यापार विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अधि॑। बृ॒बुः। प॒णी॒नाम्। वर्षि॑ष्ठे। मू॒र्धन्। अ॒स्था॒त्। उ॒रुः। कक्षः॑। न। गा॒ङ्ग्यः ॥३१॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (उरुः) बहुत (कक्षः) जल का उल्लङ्घन करनेवाला टापू वा तट आदि (गाङ्ग्यः) पृथिवी को प्राप्त होनेवाली के समीप में वर्त्तमान (न) जैसे वैसे (पणीनाम्) प्रशंसा करने योग्य व्यवहार करनेवालों के (वर्षिष्ठे) अतिशय वृद्ध (मूर्द्धन्) मस्तक में (बृबुः) काटनेवाला (अधि) ऊपर (अस्थात्) स्थित होता है, वह आप लोगों से कार्य्य में उत्तम प्रकार संयुक्त करने योग्य है ॥३१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पृथिवियों में जाती हुई नदी के मध्यस्थ टापू और तट समीप में वर्त्तमान हैं, वैसे ही व्यापारियों के समीप में शिल्पीजन वर्त्तमान होवें ॥३१॥