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Rigveda / 6 / 47 / 4

अ॒यं स यो व॑रि॒माणं॑ पृथि॒व्या व॒र्ष्माणं॑ दि॒वो अकृ॑णोद॒यं सः। अ॒यं पी॒यूषं॑ ति॒सृषु॑ प्र॒वत्सु॒ सोमो॑ दाधारो॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षम् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 47 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गर्गः | देवता : सोमः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒यम्। सः। यः। व॒रि॒माण॑म्। पृ॒थि॒व्याः। व॒र्ष्माण॑म्। दि॒वः। अकृ॑णोत्। अ॒यम्। सः। अ॒यम्। पी॒यूष॑म्। ति॒सृषु॑। प्र॒वत्ऽसु॑। सोमः॑। दा॒धा॒र॒। उ॒रु। अ॒न्तरि॑क्षम् ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (अयम्) यह (सोमः) सोमलता का रस (तिसृषु) तीन भूमि आदिकों (प्रवत्सु) नीचे के स्थलों में (पीयूषम्) अमृत को (दाधार) धारण करता है और जो (अयम्) यह (पृथिव्याः) पृथिवी से (वरिमाणम्) श्रेष्ठपने को और (दिवः) सूर्य्य के प्रकाश से (वर्ष्माणम्) वृष्टि करनेवाले को (अकृणोत्) करता है (सः) वह सब मनुष्यों से उत्तम प्रकार ग्रहण करने योग्य और जो (अयम्) यह (उरु) बहुत (अन्तरिक्षम्) मध्य में नहीं नष्ट होनेवाले को धारण करता है (सः) वह यह सब का सुख करनेवाला है ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो सोमलतारूप ओषधि का रस वायु के साथ भूमि को, किरणों के साथ सूर्य्य को धारण करता है, उसको ग्रहण और सेवन करके सब रोगरहित होओ ॥४॥