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Rigveda / 6 / 47 / 19

यु॒जा॒नो ह॒रिता॒ रथे॒ भूरि॒ त्वष्टे॒ह रा॑जति। को वि॒श्वाहा॑ द्विष॒तः पक्ष॑ आसत उ॒तासी॑नेषु सू॒रिषु॑ ॥१९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 47 | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : गर्गः | देवता : इन्द्र: | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर वह जीव इस देह में कैसा वर्त्ताव करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यु॒जा॒नः। ह॒रिता॑। रथे॑। भूरि॑। त्वष्टा॑। इ॒ह। रा॒ज॒ति॒। कः। वि॒श्वाहा॑। द्वि॒ष॒तः। पक्षः॑। आ॒स॒ते॒। उ॒त। आसी॑नेषु। सू॒रिषु॑ ॥१९॥

पदार्थ : जैसे ( कः) कोई भी सारथी (रथे) सुन्दर वाहन के सदृश शरीर में (हरिता) ले चलनेवाले घोड़ों को (युजानः) जोड़ता हुआ (भूरि) बहुत (राजति) प्रकाशित होता है, वैसे (त्वष्टा) सूक्ष्म करनेवाला जीव (इह) इस शरीर में (राजति) प्रकाशित होता है और (कः) कौन (इह) इस शरीर में (विश्वाहा) सब दिन (द्विषतः) द्वेष से युक्त का (पक्षः) ग्रहण करता (आसते) है और (उत) भी (आसीनेषु) स्थित (सूरिषु) विद्वानों में मूर्ख का आश्रय कौन करता है ॥१९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! सदा ही मूर्खों का पक्ष त्याग के विद्वानों के पक्ष में वर्त्ताव करिये और जैसे अच्छा सारथी घोड़ों को अच्छे प्रकार [वश में करके] रथ में जोड़ कर सुख से गमन आदि कार्यों को सिद्ध करता है, वैसे जितेन्द्रिय जीव सम्पूर्ण अपने प्रयोजनों को सिद्ध कर सकता है और जैसे कोई दुष्ट सारथी घोड़ों से युक्त रथ में स्थित होकर दुःखी होता है, वैसे ही अजित इन्द्रियाँ जिसमें ऐसे शरीर में स्थित होकर जीव दुःखी होता है ॥१९॥