Rigveda / 6 / 48 / 1
य॒ज्ञाय॑ज्ञा वो अ॒ग्नये॑ गि॒रागि॑रा च॒ दक्ष॑से। प्रप्र॑ व॒यम॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं प्रि॒यं मि॒त्रं न शं॑सिषम् ॥१॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 48 | Mantra No : 1
In English:
Seer : sha.myurbaarhaspatyaH | Devta : agniH | Metre : bRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yaj~naayaj~naa vo agnaye giraagiraa cha dakShase. prapra vayamamRRita.m jaatavedasa.m priya.m mitra.m na sha.msiSham .1.
Component Words : yaj~naa.ayaj~naa. vaH. agnaye. giraa.agiraa. cha. dakShase. pra.apra. vayam. amRRitam. jaata.avedasam. priyam. mitram. na. sha.msiSham .1.
In Hindi:
ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब चतुर्थाष्टक के अष्टमाध्याय का आरम्भ है, इसमें बाईस ऋचावाले अड़तालीसवें सूक्त के प्रथम मन्त्र में विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय का वर्णन करते हैं ॥
पदपाठ : य॒ज्ञाऽय॑ज्ञा। वः॒। अ॒ग्नये॑। गि॒राऽगि॑रा। च॒। दक्ष॑से। प्रऽप्र॑। व॒यम्। अ॒मृत॑म्। जा॒तऽवे॑दसम्। प्रि॒यम्। मि॒त्रम्। न। शं॒सि॒ष॒म् ॥१॥
पदार्थ : हे विद्वान् जनो ! (वः) आपके (यज्ञायज्ञा) यज्ञ-यज्ञ में (गिरागिरा, च) और वाणी-वाणी से (अग्नये) अग्नि (दक्षसे) जो कि विलक्षण है, उसके लिये (वयम्) हम लोग प्रयत्न करें। और (अमृतम्) नाश से रहित (जातवेदसम्) जातवेदस् अर्थात् जिससे विद्या उत्पन्न हुई ऐसे अग्नि (प्रियम्) मनोहर (मित्रम्) मित्र के (न) समान तुम लोगों की मैं जैसे (प्रप्र, शंसिषम्) वार-वार प्रशंसा करूँ, वैसे आप भी हम लोगों की प्रशंसा कीजिये ॥१॥
भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन आप लोगों की प्रीति उत्पन्न करें, वैसे आप भी हमारे कार्य साधने के लिये प्रीति उत्पन्न कीजिये ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ विद्वद्भिः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
पदपाठ : य॒ज्ञाऽय॑ज्ञा। वः॒। अ॒ग्नये॑। गि॒राऽगि॑रा। च॒। दक्ष॑से। प्रऽप्र॑। व॒यम्। अ॒मृत॑म्। जा॒तऽवे॑दसम्। प्रि॒यम्। मि॒त्रम्। न। शं॒सि॒ष॒म् ॥१॥
पदार्थ : (यज्ञायज्ञा) यज्ञेयज्ञे (वः) युष्माकम् (अग्नये) पावकाय (गिरागिरा) वाचा वाचा (च) (दक्षसे) (प्रप्र) (वयम्) (अमृतम्) नाशरहितम् (जातवेदसम्) जातविद्यम् (प्रियम्) कमनीयम् (मित्रम्) सखायम् (न) इव (शंसिषम्) ॥१॥
अन्वय : हे विद्वांसो ! वो यज्ञायज्ञा गिरागिरा चाऽग्नये दक्षसे वयं प्रयतेमह्यमृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न युष्मानहं यथा प्रप्र शंसिषं तथा यूयमप्यस्मान् प्रशंसत ॥१॥
भावार्थ : हे मनुष्या ! यथा विद्वांसो युष्मासु प्रीतिं जनयेयुस्तथा यूयमप्यस्माकं कार्यसाधनाय प्रीतिं जनयत ॥१॥