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Rigveda / 1 / 40 / 7

को दे॑व॒यन्त॑मश्नव॒ज्जनं॒ को वृ॒क्तब॑र्हिषम् । प्रप्र॑ दा॒श्वान्प॒स्त्या॑भिरस्थितान्त॒र्वाव॒त्क्षयं॑ दधे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 40 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : आर्चीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : कोई ही मनुष्य विद्वान् मनुष्य को प्राप्त होकर विद्या को ग्रहण कर सकता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : कः । दे॒व॒ऽयन्त॑म् । अ॒श्न॒व॒त् । जन॑म् । कः । वृ॒क्तऽब॑र्हिषम् । प्रऽप्र॑ । दा॒श्वान् । प॒स्त्या॑भिः । अ॒स्थि॒त॒ । अ॒न्तः॒ऽवाव॑त् । क्षय॑म् । द॒धे॒॥

पदार्थ : (कः) कौन मनुष्य (देवयन्तम्) विद्वानों की कामना करने और (कः) कौन (वृक्तबर्हिषम्) सब विद्याओं में कुशल सब ऋतुओं में यज्ञ करनेवाले (जनम्) सकल विद्याओं में प्रकट हुए मनुष्य को (अश्नवत्) प्राप्त तथा कौन (दाश्वान्) दानशील पुरुष (प्रास्थित) प्रतिष्ठा को प्राप्त होवे और कौन (पस्त्याभिः) उत्तमगृहवाली भूमि में (अन्तर्वावत्) सबके अन्तर्गत चलनेवाले वायु से युक्त (क्षयम्) निवास करने योग्य घरको (दधे) धारण करे ॥७॥

भावार्थ : सब मनुष्य विद्या प्रचार की कामनावाले उत्तम विद्वान् को नहीं प्राप्त होते और न सब दानशील होकर सब ऋतुओं में सुखरूप घर को धारण कर सकते हैं, किन्तु कोई ही भाग्यशाली विद्वान् मनुष्य इन सबको प्राप्त हो सकता है ॥७॥