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Rigveda / 6 / 52 / 3

किम॒ङ्ग त्वा॒ ब्रह्म॑णः सोम गो॒पां किम॒ङ्ग त्वा॑हुरभिशस्ति॒पां नः॑। किम॒ङ्ग नः॑ पश्यसि नि॒द्यमा॑नान्ब्रह्म॒द्विषे॒ तपु॑षिं हे॒तिम॑स्य ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 52 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य कैसे परीक्षक हों, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : किम्। अ॒ङ्ग। त्वा॒। ब्रह्म॑णः। सो॒म॒। गो॒पाम्। किम्। अ॒ङ्ग। त्वा॒। आ॒हुः॒। अ॒भि॒श॒स्ति॒ऽपाम्। नः॒। किम्। अ॒ङ्ग। नः॒। प॒श्य॒सि॒। नि॒द्यमा॑नान्। ब्र॒ह्म॒ऽद्विषे॑। तपु॑षिम्। हे॒तिम्। अ॒स्य॒ ॥३॥

पदार्थ : हे (अङ्ग) मित्र (सोम) ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले जन ! (किम्) क्या (त्वा) तुझे (ब्रह्मणः) धन का (गोपाम्) रक्षा करनेवाला (आहुः) कहें। हे (अङ्ग) मित्र ! (किम्) क्या (त्वा) तुझे (अभिशस्तिपाम्) सामने प्रशंसा रखनेवाले कहते हैं। हे (अङ्ग) सखे मित्र ! तू (नः) हम लोगों को (किम्) क्या (पश्यसि) देखता है। हे मित्र तू (निद्यमानान्) निन्दा प्राप्त (नः) लोगों को क्या देखता है (ब्रह्मद्विषे) वेदविद्या द्वेषी जनके लिये (तपुषिम्) अति तपे हुए (हेतिम्) वज्र को क्या नहीं देखता (अस्य) इस पर वज्र प्रहार कर ॥३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! तुम इस धन के रक्षक क्यों नहीं होते हो, स्तुति (प्रशंसा) करनेवाले हम लोगों को निन्दा करनेवाले भ्रम से मत देखो, निश्चय धनपति तथा वेदविद्या से द्वेष करते हैं, उनका सङ्ग युद्ध विना मत करो ॥३॥