Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 52 / 6

इन्द्रो॒ नेदि॑ष्ठ॒मव॒साग॑मिष्ठः॒ सर॑स्वती॒ सिन्धु॑भिः॒ पिन्व॑माना। प॒र्जन्यो॑ न॒ ओष॑धीभिर्मयो॒भुर॒ग्निः सु॒शंसः॑ सु॒हवः॑ पि॒तेव॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 52 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : ऋजिश्वाः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रः॑। नेदि॑ष्ठम्। अव॑सा। आऽग॑मिष्ठः। सर॑स्वती। सिन्धु॑ऽभिः। पिन्व॑माना। प॒र्जन्यः॑। नः॒। ओष॑धीभिः। म॒यः॒ऽभुः। अ॒ग्निः। सु॒ऽशंसः॑। सु॒ऽहवः॑। पि॒ताऽइ॑व ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अवसा) रक्षा आदि से (नेदिष्ठम्) अतीव समीप को (आगमिष्ठः) अतीव आनेवाला वा (सिन्धुभिः) नदियों से (पिन्वमाना) संयुक्त (सरस्वती) प्रशंसित सरस् वेग जिसका उस नदी के समान (सुशंसः) शोभन तथा (सुहवः) शोभन सत्कारवाले (अग्निः) अग्नि के समान (ओषधिभिः) ओषधियों से युक्त (पर्जन्यः) मेघ (मयोभुः) सुख हुवाने तथा (पितेव) जन्म देनेवाले पिता के समान (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (नः) हम लोगों को पालना करता है, वह राजा हम लोगों से निरन्तर सत्कार करने योग्य है ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा न्याय और पुरुषार्थ से प्रजा की निरन्तर रक्षा करता है, उसकी पिता के समान प्रजाजन पालना करते हैं ॥६॥