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Rigveda / 6 / 60 / 6

ह॒तो वृ॒त्राण्यार्या॑ ह॒तो दासा॑नि॒ सत्प॑ती। ह॒तो विश्वा॒ अप॒ द्विषः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 60 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे कैसे हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ह॒तः। वृ॒त्राणि॑। आर्या॑। ह॒तः। दासा॑नि। सत्प॑ती॒ इति॒ सत्ऽप॑ती। ह॒तः। विश्वाः॑। अप॑। द्विषः॑ ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (आर्या) उत्तम गुणकर्मस्वभावयुक्त (सत्पती) सज्जन पुरुषों के व्यवहारों के पालनेवाले सूर्य्य और बिजुली (वृत्राणि) मेघ के अवयवों को जैसे वैसे (विश्वा) समस्त (द्विषः) शत्रुजनों को (अप, हतः) मारते हैं वा (दासानि) दानों को (हतः) नष्ट करते हैं वा दुःखों को (हतः) दूर करते हैं, वे सत्कार करने योग्य हैं ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो श्रेष्ठ गुणकर्मस्वभाववाले मनुष्य, सत्य धर्मनिष्ठ, आप्त सज्जनों के पालने और दुष्टों को हरनेवाले हों, उनका सदा सत्कार करो ॥६॥