Rigveda / 6 / 61 / 1
इ॒यम॑ददाद्रभ॒समृ॑ण॒च्युतं॒ दिवो॑दासं वध्र्य॒श्वाय॑ दा॒शुषे॑। या शश्व॑न्तमाच॒खादा॑व॒सं प॒णिं ता ते॑ दा॒त्राणि॑ तवि॒षा स॑रस्वति ॥१॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 61 | Mantra No : 1
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : sarasvatii | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : iyamadadaadrabhasamRRiNachyuta.m divodaasa.m vadhryashvaaya daashuShe. yaa shashvantamaachakhaadaavasa.m paNi.m taa te daatraaNi taviShaa sarasvati .1.
Component Words : iyam. adadaat. rabhasam. RRINa.achyutam. divaH.adaasam. vadhri.aashvaaya. daashuShe. yaa. shashvantam. aa.achakhaada. avasam. paNim. taa. te. daatraaNi. taviShaa. sarasvati .1.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : अब चौदह ऋचावाले एकसठवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में यह वाणी क्या देती है, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : इ॒यम्। अ॒द॒दा॒त्। र॒भ॒सम्। ऋ॒ण॒ऽच्युत॑म्। दिवः॑ऽदासम्। व॒ध्रि॒ऽअ॒श्वाय॑। दा॒शुषे॑। या। शश्व॑न्तम्। आ॒ऽच॒खाद॑। अ॒व॒सम्। प॒णिम्। ता। ते॒। दा॒त्राणि॑। त॒वि॒षा। स॒र॒स्व॒ति॒ ॥१॥
पदार्थ : हे (सरस्वति) विदुषी (या) जो (इयम्) यह (वध्र्यश्वाय) बढ़ानेवाले घोड़ों से युक्त (दाशुषे) दानशील के लिये (रभसम्) वेग (ऋणच्युतम्) ऋण से छूटे (दिवोदासम्) विद्या प्रकाश के देनेवाले को (अददात्) देती है तथा (शश्वन्तम्) अनादि वेदविद्याविषय जो कि (अवसम्) रक्षक तथा (पणिम्) प्रशंसनीय है उसको (आचखाद) स्थिर करती है, वह (ते) आपके (तविषा) बल से (ता) उन (दात्राणि) दानों को देती है, यह जानो ॥१॥
भावार्थ : जो स्त्री विद्या शिक्षायुक्त वाणी को ग्रहण करती है, वह अनादिभूत वेदविद्या को जानने योग्य होती है, वह जिसके साथ विवाह करे, उसका अहोभाग्य होता है, यह जानने योग्य है ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : अथेयं वाक् किं ददातीत्याह ॥
पदपाठ : इ॒यम्। अ॒द॒दा॒त्। र॒भ॒सम्। ऋ॒ण॒ऽच्युत॑म्। दिवः॑ऽदासम्। व॒ध्रि॒ऽअ॒श्वाय॑। दा॒शुषे॑। या। शश्व॑न्तम्। आ॒ऽच॒खाद॑। अ॒व॒सम्। प॒णिम्। ता। ते॒। दा॒त्राणि॑। त॒वि॒षा। स॒र॒स्व॒ति॒ ॥१॥
पदार्थ : (इयम्) (अददात्) ददाति (रभसम्) वेगम् (ऋणच्युतम्) ऋणादयुक्तम् (दिवोदासम्) विद्याप्रकाशस्य दातारम् (वध्र्यश्वाय) वध्रयो वर्धका अश्वा यस्य तस्मै (दाशुषे) दात्रे (या) (शश्वन्तम्) अनादिभूतं वेदविद्याविषयम् (आचखाद) स्थिरीकरोति (अवसम्) रक्षकम् (पणिम्) प्रशंसनीयम् (ता) तानि (ते) तव (दात्राणि) दानानि (तविषा) बलेन (सरस्वति) विदुषि ॥१॥
अन्वय : हे सरस्वति ! येयं वध्र्यश्वाय दाशुषे रभसमृणच्युतं दिवोदासमददाच्छश्वन्तमवसं पणिमाचखाद सा ते तविषा ता दात्राणि ददातीति विजानीहि ॥१॥
भावार्थ : या स्त्री विद्याशिक्षायुक्तां वाचं गृह्णाति साऽनादिभूतां वेदविद्यां वेत्तुमर्हति सा येन सह विवाहं कुर्यात्तस्याऽहोभाग्यं भवतीति विज्ञेयम् ॥१॥