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Rigveda / 6 / 61 / 6

त्वं दे॑वि सरस्व॒त्यवा॒ वाजे॑षु वाजिनि। रदा॑ पू॒षेव॑ नः स॒निम् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 61 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह क्या करती है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। दे॒वि॒। स॒र॒स्व॒ति॒। अव॑। वाजे॑षु। वा॒जि॒नि॒। रद॑। पू॒षाऽइ॑व। नः॒। स॒निम् ॥६॥

पदार्थ : हे (देवि) कामना करनेवाली (वाजिनि) प्रशस्तविज्ञानयुक्त (सरस्वति) विदुषी स्त्री ! (त्वम्) तू (नः) हमारी (सनिम्) सत्य और असत्य के विभाग करनेवाली बुद्धि को (वाजेषु) प्राप्तव्य पदार्थों में (पूषेव) भूमि के समान (अवा) पालो और (रदा) विशेषता से लिखो ॥६॥

भावार्थ : हे वरानने=सुन्दर मुखवाली ! तुम पृथिवी के समान सबका धारण करो और प्रज्ञा देओ ॥६॥