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Rigveda / 1 / 42 / 3

अप॒ त्यं प॑रिप॒न्थिनं॑ मुषी॒वाणं॑ हुर॒श्चित॑म् । दू॒रमधि॑ स्रु॒तेर॑ज ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 42 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : पूषा | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर इस मार्ग से किन-२ का निवारण करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अप॑ । त्यम् । प॒रि॒ऽप॒न्थिन॑म् । मु॒षी॒वाण॑म् । हु॒रः॒ऽचित॑म् । दू॒रम् । अधि॑ । स्रु॒तेः । अ॒ज॒॥

पदार्थ : हे विद्वन् राजन् ! आप (त्यम्) उस (परिपंथिनम्) प्रतिकूल चलनेवाले डांकू (मुषीवाणम्) चोर कर्म से भित्ति को फोड़ कर दृष्टि का आच्छादन कर दूसरे के पदार्थों को हरने (हुरश्चितम्) उत्कोचक अर्थात् हाथ से दूसरे के पदार्थ को ग्रहण करनेवाले अनेक प्रकार से चोरों को (स्रुतेः) राजधर्म और प्रजामार्ग से (दूरम्) (अध्यपाज) उनपर दण्ड और शिक्षा कर दूर कीजिये ॥३॥

भावार्थ : चोर अनेक प्रकार के होते हैं, कोई डांकू कोई कपट से हरने, कोई मोहित करके दूसरे के पदार्थों को ग्रहण करने, कोई रात में सुरंग लगाकर ग्रहण, करने कोई उत्कोचक अर्थात् हाथ से छीन लेने, कोई नाना प्रकार के व्यवहारी दुकानों में बैठ छल से पदार्थों को हरने, कोई शुल्क अर्थात् रिशवत लेने, कोई भृत्य होकर स्वामी के पदार्थों को हरने, कोई छल कपट से ओरों के राज्य को स्वीकार करने, कोई धर्मोपदेश से मनुष्यों को भ्रमाकर गुरु बन शिष्यों के पदार्थों को हरने, कोई प्राड्विवाक अर्थात् वकील होकर मनुष्यों को विवाद में फंसाकर पदार्थों को हरलेने और कोई न्यायासन पर बैठ प्रजा से धन लेके अन्याय करनेवाले इत्यादि हैं, इन सबको चोर जानो, इनको सब उपायों से निकाल कर मनुष्यों को धर्म से राज्य का पालन करना चाहिये ॥३॥