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Rigveda / 6 / 61 / 9

सा नो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॒ स्वसॄ॑र॒न्या ऋ॒ताव॑री। अत॒न्नहे॑व॒ सूर्यः॑ ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 61 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह कैसी है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सा। नः॒। विश्वा॑। अति॑। द्विषः॑। स्वसॄः॑। अ॒न्याः। ऋ॒तऽव॑री। अत॑न्। अहा॑ऽइव। सूर्यः॑ ॥९॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (सा) वह (ऋतावरी) उषा=प्रभातवेला (नः) हमारे (विश्वाः) समस्त (द्विषः) द्वेषी जनों को (अति) अतिक्रमण=उल्लङ्घन कराती है और (सूर्यः) सूर्य (अहेव) दिनों को जैसे (अतन्) व्याप्त होता, वैसे (अन्याः) और (स्वसॄः) भगिनियों के समान वर्त्तमान गत विगत प्रभातवेलाओं का संयोग करती है ॥९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो वाणी अच्छे प्रकार प्रयोग की हुई सुख और अन्यथा कही हुई दुःख प्रदान करती है। जो सत्यवादी हैं, वे ही मिथ्या कहना नहीं चाहते, जैसे सूर्य समस्त मूर्त्तिमान् द्रव्यों को प्रकाशित करता है, वैसे ही यह वाणी सब व्यवहारों को प्रकाशित करती है ॥९॥