Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 61 / 11

आ॒प॒प्रुषी॒ पार्थि॑वान्यु॒रु रजो॑ अ॒न्तरि॑क्षम्। सर॑स्वती नि॒दस्पा॑तु ॥११॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 61 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह कैसी और क्या करती है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ॒ऽप॒प्रुषी॑। पार्थि॑वानि। उ॒रु। रजः॑। अ॒न्तरि॑क्षम्। सर॑स्वती। नि॒दः। पा॒तु॒ ॥११॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (पार्थिवानि) अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध हुए वा विदित हुए (उरु) बहुत (रजः) परमाणु आदि पदार्थों को तथा (अन्तरिक्षम्) आकाश को (आपप्रुषी) सब ओर से व्याप्त (सरस्वती) विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त वाणी हम लोगों को (निदः) निन्दकों से (पातु) बचावे ॥११॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो वाणी सर्वत्र आकाश में व्याप्त है, उसको जान के इससे किसी की भी निन्दा अर्थात् गुणों में दोषारोपण और दोषों में गुणारोपण कभी न करो ॥११॥