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Rigveda / 6 / 62 / 7

वि ज॒युषा॑ रथ्या यात॒मद्रिं॑ श्रु॒तं हवं॑ वृषणा वध्रिम॒त्याः। द॒श॒स्यन्ता॑ श॒यवे॑ पिप्यथुर्गामिति॑ च्यवाना सुम॒तिं भु॑रण्यू ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 62 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उनसे क्या होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। ज॒युषा॑। र॒थ्या॒। या॒त॒म्। अद्रि॑म्। श्रु॒तम्। हव॑म्। वृ॒ष॒णा॒। व॒ध्रि॒ऽम॒त्याः। द॒श॒स्यन्ता॑। श॒यवे॑। पि॒प्य॒थुः॒। गाम्। इति॑। च्य॒वा॒ना॒। सु॒ऽम॒तिम्। भु॒र॒ण्यू॒ इति॑ ॥७॥

पदार्थ : हे अध्यापक और उपदेशक सज्जनो ! (वध्रिमत्याः) जिसमें बहुत वर्धन विद्यमान उस भूमि वा अन्तरिक्ष के बीच (जयुषा) जयशील (रथ्या) रथ के लिये हितकारी (वृषणा) वर्षा तथा (दशस्यन्ता) बल करानेवाले (अद्रिम्) मेघ को (वि, यातम्) विशेषता से प्राप्त होते हैं और (सुमतिम्) सुन्दर मति को (च्यवाना) शीघ्र जानेवाले (भुरण्यू) पालना वा धारणकर्त्ता (गाम्) वाणी को (इति) इस प्रकार से (शयवे) सोने के लिये (पिप्यथुः) बढ़ाते हैं, उनके (हवम्) विद्या विषयक शब्द को तुम (श्रुतम्) सुनो ॥७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो विमान आदि को चलाने वा सङ्ग्राम में जय कराने वा प्रज्ञा और बल के देने, वर्षा करनेवाले तथा सोने जागने और वाणी के हेतु हैं, उनको जान कार्य्यसिद्धि के लिये अच्छे प्रकार प्रयोग करो ॥७॥