Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 42 / 5

आ तत्ते॑ दस्र मन्तुमः॒ पूष॒न्नवो॑ वृणीमहे । येन॑ पि॒तॄनचो॑दयः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 42 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : पूषा | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह न्यायाधीश कैसा होवे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : आ । तत् । ते॒ । द॒स्र॒ । म॒न्तु॒ऽमः॒ । पू॒ष॒न् । अवः॑ । वृ॒णी॒म॒हे॒ । येन॑ । पि॒तॄन् । अचो॑दयः॥

पदार्थ : हे (दस्र) दुष्टों को नाश करने (मन्तुमः) उत्तम ज्ञानयुक्त (पूषन्) सर्वथा पुष्टि करनेवाले विद्वान् ! आप (येन) जिस रक्षादि से (पितॄन्) अवस्था वा ज्ञान से वृद्धों को (अचोदयः) प्रेरणा करो (तत्) उस (ते) आपके (अवः) रक्षादि को हम लोग (आवृणीमहे) सर्वथा स्वीकार करें ॥५॥

भावार्थ : जैसे प्रेम प्रीति के साथ सेचन करने से उत्पन्न करने वा पढ़ानेवाले ज्ञान वा अवस्था से वृद्धों को तृप्त करें वैसे ही सब प्रजाओं के सुख के लिये दुष्ट मनुष्यों को दण्ड दे के धार्मिकों को सदा सुखी रक्खें ॥५॥