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Rigveda / 6 / 66 / 1

वपु॒र्नु तच्चि॑कि॒तुषे॑ चिदस्तु समा॒नं नाम॑ धे॒नु पत्य॑मानम्। मर्ते॑ष्व॒न्यद्दो॒हसे॑ पी॒पाय॑ स॒कृच्छु॒क्रं दु॑दुहे॒ पृश्नि॒रूधः॑ ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 66 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब ग्यारह ऋचावाले छियासठवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर वह किसके तुल्य क्या करती है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वपुः॑। नु। तत्। चि॒कि॒तुषे॑। चि॒त्। अ॒स्तु॒। स॒मा॒नम्। नाम॑। धे॒नु। पत्य॑मानम्। मर्ते॑षु। अ॒न्यत्। दो॒हसे॑। पी॒पाय॑। स॒कृत्। शु॒क्रम्। दु॒दु॒हे॒। पृश्निः॑। ऊधः॑ ॥१॥

पदार्थ : हे पत्नि ! जैसे (ऊधः) रात्रि और (पृश्निः) अन्तरिक्ष (सकृत्) एक वार (शुक्रम्) शीघ्र वीर्य करनेवाले को (दुदुहे) परिपूर्ण करता है, वैसे (धेनु) वाणी के समान तू (मर्त्तेषु) मनुष्यों में (पत्यमानम्) जाते हुए पति को (अन्यत्) और को जैसे वैसे (दोहसे) पूर्ण करने को (पीपाय) बढ़ाओ ऐसी हुई जो तू उसका जो (चित्) निश्चित (समानम्) समान (वपुः) सुन्दररूप और (नाम) नाम है (तत्) वह (चिकितुषे) विज्ञानवान् पति के लिये (नु, अस्तु) शीघ्र हो ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे पुरुष ! जैसे रात्रि और समीप में मायारूपी अन्तरिक्ष वर्षा से होता अर्थात् मेघ से ढपा हुआ अन्तरिक्ष अन्धकारयुक्त होता है, वैसे ही समान गुणकर्मस्वभावयुक्त स्त्री पति के सुख के लिये समर्थ होती है, जैसे गौ बछड़ों को पालती है, वैसे विदुषी माता सन्तानों की यथावत् रक्षा कर सकती है ॥१॥