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Rigveda / 6 / 66 / 3

रु॒द्रस्य॒ ये मी॒ळ्हुषः॒ सन्ति॑ पु॒त्रा यांश्चो॒ नु दाधृ॑वि॒र्भर॑ध्यै। वि॒दे हि मा॒ता म॒हो म॒ही षा सेत्पृश्निः॑ सु॒भ्वे॒३॒॑ गर्भ॒माधा॑त् ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 66 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : किन स्त्री-पुरुषों के पुत्र उत्तम होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : रु॒द्रस्य॑। ये। मी॒ळ्हुषः॑। सन्ति॑। पु॒त्राः। यान्। चो॒ इति॑। नु। दाधृ॑विः। भर॑ध्यै। वि॒दे। हि। मा॒ता। म॒हः। म॒ही। सा। सा। इत्। पृश्निः॑। सु॒ऽभ्वे॑। गर्भ॑म्। आ। अ॒धा॒त् ॥३॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (ये) जो (मीळ्हुषः) वीर्य सींचनेवाले (रुद्रस्य) वायु के समान बलिष्ठ के (पुत्राः) पुत्र (सन्ति) हैं (यान्, चो) और जिनको (भरध्यै) पोषण वा धारण करने के लिये (दाधृविः) धारण करनेवाली (मही) जो महान् सत्कार करने योग्य है (सा) वह (माता) मान करनेवाली (आ, अधात्) अच्छे प्रकार धारण करती है और (सा, इत्) वही (पृश्निः) अन्तरिक्ष के समान विस्तारवाली (सुभ्वे) जो सुन्दर प्रसिद्ध होता है उस (विदे) जाननेवाले के लिये (हि) ही (महः) महान् (गर्भम्) गर्भ को (नु) शीघ्र अच्छे प्रकार धारण करती है, उन सबको और उस माता रूप स्त्री को तुम सब भाग्ययुक्त जानो ॥३॥

भावार्थ : वे ही मनुष्य कल्याणरूप होते हैं, जिनके माता पिता ऐसे हैं कि जिन्होंने पूरा ब्रह्मचर्य किया हो ॥३॥