Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 69 / 5

इन्द्रा॑विष्णू॒ तत्प॑न॒याय्यं॑ वां॒ सोम॑स्य॒ मद॑ उ॒रु च॑क्रमाथे। अकृ॑णुतम॒न्तरि॑क्षं॒ वरी॒योऽप्र॑थतं जी॒वसे॑ नो॒ रजां॑सि ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 69 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्राविष्णू | छन्द : ब्राह्म्युष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर वे क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रा॑विष्णू॒ इति॑। तत्। प॒न॒याय्य॑म्। वा॒म्। सोम॑स्य। मदे॑। उ॒रु। च॒क्र॒मा॒थे॒ इति॑। अकृ॑णुतम्। अ॒न्तरि॑क्षम्। वरी॑यः। अप्र॑थतम्। जी॒वसे॑। नः॒। रजां॑सि ॥५॥

पदार्थ : हे राजा और प्रजाजनो ! जो (इन्द्राविष्णू) वायु और सूर्य्य (सोमस्य) ऐश्वर्य्य का (मदे) आनन्द प्राप्त होने पर (तत्) उस (अन्तरिक्षम्) भूमि और सूर्य्य के बीच की पोल को (पनयाय्यम्) प्रशंसा के योग्य करते हैं उनकी (वाम्) तुम (उरु) बहुत (चक्रमाथे) कामना करो और (वरीयः) अत्यन्त श्रेष्ठ को (अप्रथतम्) विख्यात करो उससे (नः) हम लोगों के (जीवसे) जीवन को तथा (रजांसि) ऐश्वर्य्यों को (अकृणुतम्) सिद्ध करो ॥५॥

भावार्थ : हे राजप्रजाजनो ! जैसे यज्ञ से शोधे हुए वायु और बिजुली समस्त चराचर जगत् को प्रशंसा के योग्य और नीरोग करते हैं, वैसे विधान कर उससे हमारे ऐश्वर्य्य और जीवन को अधिक करो ॥५॥