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Rigveda / 6 / 70 / 2

अस॑श्चन्ती॒ भूरि॑धारे॒ पय॑स्वती घृ॒तं दु॑हाते सु॒कृते॒ शुचि॑व्रते। राज॑न्ती अ॒स्य भुव॑नस्य रोदसी अ॒स्मे रेतः॑ सिञ्चतं॒ यन्मनु॑र्हितम् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 70 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे कैसे हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अस॑श्चन्ती॒ इति॑। भूरि॑धारे॒ इति॒ भूरि॑ऽधारे। पय॑स्वती॒ इति॑। घृ॒तम्। दु॒हा॒ते॒ इति॑। सु॒ऽकृते॑। शुचि॑व्रते॒ इति॒ शुचि॑ऽव्रते। राज॑न्ती॒ इति॑। अ॒स्य। भुव॑नस्य। रो॒द॒सी॒ इति॑। अ॒स्मे इति॑। रेतः॑। सि॒ञ्च॒त॒म्। यत्। मनुः॑ऽहितम् ॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (असश्चन्ती) अलग-अलग वर्त्तमान (भूरिधारे) जिनकी बहुत धारायें विद्यमान (पयस्वती) जो बहुत जल से युक्त (सुकृते) जो ईश्वर ने सुन्दर बनाये वा अच्छे कर्म करानेवाले और (शुचिव्रते) पवित्र कर्मयुक्त हैं तथा (अस्य) इस (भुवनस्य) ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में (राजन्ती) प्रकाशमान हैं, वे (रोदसी) आकाश और पृथिवी (अस्मे) हम लोगों में (यत्) जो (मनुर्हितम्) मनुष्यों का हित करनेवाला है, उस (घृतम्) जल को (दुहाते) पूर्ण करते हैं, उस (रेतः) जल वा वीर्य्य को (सिञ्चतम्) सींचते हैं, उन्हें यथावत् उपकार के लिये प्राप्त होओ ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! सूर्य्य और भूमि ही सब जगत् की रक्षा के निमित्त, बहुत उदक आदि पदार्थयुक्त और सब के काम को पूर्ण करते हैं, उनको यथावत् जानकर कार्य्य की सिद्धि के लिये अच्छे प्रकार उनका प्रयोग करो ॥२॥