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Rigveda / 6 / 72 / 4

इन्द्रा॑सोमा प॒क्वमा॒मास्व॒न्तर्नि गवा॒मिद्द॑धथुर्व॒क्षणा॑सु। ज॒गृ॒भथु॒रन॑पिनद्धमासु॒ रुश॑च्चि॒त्रासु॒ जग॑तीष्व॒न्तः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 72 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रासोमौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे किसके तुल्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रा॑सोमा। प॒क्वम्। आ॒मासु॑। अ॒न्तः। नि। गवा॑म्। इत्। द॒ध॒थुः॒। व॒क्षणा॑सु। ज॒गृ॒भथुः॑। अन॑पिऽनद्धम्। आ॒सु॒। रुश॑त्। चि॒त्रासु॑। जग॑तीषु। अ॒न्तरिति॑ ॥४॥

पदार्थ : हे अध्यापक और उपदेशको ! तुम दोनों जैसे (इन्द्रासोमा) पवन और बिजुली (आमासु) न पकी हुई सामग्रियों के (अन्तः) बीच (पक्वम्) पाक को (नि, दधथुः) स्थापन करते हैं और (गवाम्) किरणों के बीच (इत्) निश्चित तथा (आसु) इन (वक्षणासु) नदियों में (अनपिनद्धम्) खुला हुआ (जगृभथुः) ग्रहण करते हैं तथा इन (चित्रासु) अद्भुत (जगतीषु) सृष्टियों के (अन्तः) बीच (रुशत्) सुरूप को धारण करते हैं, वैसे तुम वर्तो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजुली और सोम के समान सब में दृढ़ ज्ञान स्थापन कर नदी के प्रवाह के तुल्य आगे चलाते हैं, वे संसार में कल्याण करनेवाले होते हैं ॥४॥