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Rigveda / 1 / 43 / 4

गा॒थप॑तिं मे॒धप॑तिं रु॒द्रं जला॑षभेषजम् । तच्छं॒योः सु॒म्नमी॑महे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 43 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : रुद्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह रुद्र कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : गा॒थऽप॑तिम् । मे॒धऽप॑तिम् । रु॒द्रम् । जला॑षऽभेषजम् । तत् । श॒म्ऽयोः । सु॒म्नम् । ई॒म॒हे॒॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (गाथपतिम्) स्तुति करनेवालों के पालक (मेधपतिम्) यज्ञ वा पवित्र पुरुषों की पालना करनेवाले (जलाषभेषजम्) जिससे सुख के लिये ओषधी हो उस (रुद्रम्) परमेश्वर के आश्रम होकर (तत्) उस विज्ञान वा (शंयोः) व्यावहारिक पारमार्थिक सुख से भी (सुम्नम्) मोक्ष के सुख की (ईमहे) याचना करते हैं वैसे तुम भी करो ॥४॥

भावार्थ : कोई भी मनुष्य स्तुति यज्ञ वा दुःखों के नाश करनेवाली ओषधियों की प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर विद्वान् और प्राणायाम के विना विज्ञान और लौकिक सुख वा मोक्ष सुख प्राप्त होने के योग्य नहीं हो सकता ॥४॥