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Rigveda / 1 / 43 / 6

शं नः॑ कर॒त्यर्व॑ते सु॒गं मे॒षाय॑ मे॒ष्ये॑ । नृभ्यो॒ नारि॑भ्यो॒ गवे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 43 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : रुद्रः | छन्द : पादनिचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : वह उसके लिये क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : शन् । नः॒ । क॒र॒ति॒ । अर्व॑ते । सु॒ऽगम् । मे॒षाय॑ । मे॒ष्ये॑ । नृऽभ्यः॑ । नारि॑ऽभ्यः । गवे॑॥

पदार्थ : जो रुद्रस्वामी (नः) हम लोगों की (अर्वते) अश्वजाती (मेषाय) मेषजाति (मेष्ये) भेड़ बकरी (नृभ्यः) मनुष्य जाति (नारिभ्यः) स्त्री जाती और (गवे) गो जाति के लिये (सुगम्) सुगम् (शम्) सुख को (करति) निरन्तर करै वही न्यायाधीश करना चाहिये ॥६॥

भावार्थ : मनुष्यों को अपने वा पराए पशु, मनुष्यों के लिये परमेश्वर की प्रार्थना, विद्वानों की सहायता, प्राणवायुओं से यथावत् उपयोग और अपना पुरुषार्थ करना चाहिये ॥६॥