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Rigveda / 7 / 1 / 7

विश्वा॑ अ॒ग्नेऽप॑ द॒हारा॑ती॒र्येभि॒स्तपो॑भि॒रद॑हो॒ जरू॑थम्। प्र नि॑स्व॒रं चा॑तय॒स्वामी॑वाम् ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 1 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर अग्नि से [कैसा] उपकार लेना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : विश्वाः॑। अ॒ग्ने॒। अप॑। द॒ह॒। अरा॑तीः। येभिः॑। तपः॑ऽभिः। अद॑हः। जरू॑थम्। प्र। नि॒ऽस्व॒रम्। चा॒त॒य॒स्व॒। अमी॑वाम् ॥७॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् ! (येभिः) जिन (तपोभिः) हाथों को तपानेवाले अग्नि के गुणों से अग्नि (जरूथम्) जीर्ण अवस्था को प्राप्त हुए पुराने काष्ठ को (अदहः) जलाता है उन गुणों से (विश्वाः) सब (अरातीः) शत्रुओं की सेनाओं को (अप, दह) जलाइये तथा (अमीवाम्) रोग को (निस्वरम्) निर्मूल जैसे हो, वैसे (प्र, चातयस्व) नष्ट कीजिये ॥७॥

भावार्थ : हे विद्वानो ! जो आप अग्नि के प्रभाव को जान के आग्नेयास्त्र आदिकों को बना के संग्राम में प्रवृत्त हों तो अनेक शत्रुओं की सेनाएँ शीघ्र भस्म होवें, जैसे उत्तम वैद्य अपने शरीर को रोगरहित करके अन्यों को रोगरहित करता है, वैसे ही आप लोग अग्निविद्या के प्रभाव से रोगरूप शत्रुओं का निवारण करो ॥७॥