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Rigveda / 7 / 1 / 13

पा॒हि नो॑ अग्ने र॒क्षसो॒ अजु॑ष्टात्पा॒हि धू॒र्तेरर॑रुषो अघा॒योः। त्वा यु॒जा पृ॑तना॒यूँर॒भि ष्या॑म् ॥१३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 1 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : किस करके किससे किसकी रक्षा करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : पा॒हि। नः॒। अ॒ग्ने॒। र॒क्षसः॑। अजु॑ष्टात्। पा॒हि। धू॒र्तेः। अर॑रुषः। अ॒घ॒ऽयोः। त्वा। यु॒जा। पृ॒त॒ना॒ऽयून्। अ॒भि। स्या॒म् ॥१३॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्युत् अग्नि के तुल्य वर्त्तमान राजन् या उपदेशक ! आप (नः) हमको (रक्षसः) दुष्टाचारी मनुष्यों से (पाहि) बचाइये। हमारी (अजुष्टात्) धर्म का सेवन न करते हुए अधर्मी (धूर्तेः) धूर्त (अररुषः) शीघ्र मारनेवाले (अघायोः) आत्मा को पाप की इच्छा करते हुए से (पाहि) रक्षा कीजिये (युजा) युक्त हुए (त्वा) तुम्हारे साथ वर्त्तमान मैं (पृतनायून्) सेनाओं को चाहते हुओं के (अभि, ष्याम्) सम्मुख होऊँ ॥१३॥

भावार्थ : वही राजा अध्यापक उपदेशक वा कर्म करनेहारा श्रेष्ठ होता है, जो आप धर्मात्मा होकर अन्यों को भी धार्मिक करे ॥१३॥