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Rigveda / 7 / 2 / 7

विप्रा॑ य॒ज्ञेषु॒ मानु॑षेषु का॒रू मन्ये॑ वां जा॒तवे॑दसा॒ यज॑ध्यै। ऊ॒र्ध्वं नो॑ अध्व॒रं कृ॑तं॒ हवे॑षु॒ ता दे॒वेषु॑ वनथो॒ वार्या॑णि ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 2 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : आप्रियः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे स्त्री-पुरुष कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : विप्रा॑। य॒ज्ञेषु॑। मानु॑षेषु। का॒रू इति॑। मन्ये॑। वा॒म्। जा॒तऽवे॑दसा। यज॑ध्यै। ऊ॒र्ध्वम्। नः॒। अ॒ध्व॒रम्। कृ॒त॒म्। हवे॑षु। ता। दे॒वेषु॑। व॒न॒थः॒। वार्या॑णि ॥७॥

पदार्थ : हे स्त्रीपुरुषो ! जो (मानुषेषु) मनुष्यसम्बन्धी (यज्ञेषु) सत्कर्मों में (कारू) वा शिल्पविद्या में कुशल वा पुरुषार्थी (जातवेदसा) विद्या को प्रसिद्ध प्राप्त हुए (विप्रा) बुद्धिमान् तुम दोनों (नः) हमारे (हवेषु) जिन में ग्रहण करते उन घरों में (अध्वरम्) रक्षा करने योग्य गृहाश्रमादि के व्यवहार को (ऊर्ध्वम्) उन्नत (कृतम्) करो (देवेषु) दिव्य गुणों वा विद्वानों में (वार्याणि) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को (वनथः) सम्यक् सेवन करो (ता) वे (वाम्) तुम दोनों (यजध्यै) सङ्ग करने के अर्थ मैं (मन्ये) मानता, वैसे तुम दोनों मुझ को मानो ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे ब्रह्मचर्यसेवन से विद्या को प्राप्त हुए क्रिया में कुशल विद्वान् स्त्रीपुरुष सब घर के कामों को शोभित करने को समर्थ होते हैं और वे सङ्ग करने योग्य होते हैं, वैसे तुम लोग भी होओ ॥७॥