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Rigveda / 7 / 3 / 7

यथा॑ वः॒ स्वाहा॒ग्नये॒ दाशे॑म॒ परीळा॑भिर्घृ॒तव॑द्भिश्च ह॒व्यैः। तेभि॑र्नो अग्ने॒ अमि॑तै॒र्महो॑भिः श॒तं पू॒र्भिराय॑सीभि॒र्नि पा॑हि ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 3 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य परस्पर कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यथा॑। वः॒। स्वाहा॑। अ॒ग्नये॑। दाशे॑म। परि॑। इळा॑भिः। घृ॒तव॑त्ऽभिः। च॒। ह॒व्यैः। तेभिः॑। नः॒। अ॒ग्ने॒। अमि॑तैः। महः॑ऽभिः। श॒तम्। पूः॒ऽभिः। आय॑सीभिः। नि। पा॒हि॒ ॥७॥

पदार्थ : हे विद्वान् लोगो ! (यथा) जैसे हम लोग (वः) तुम्हारे अर्थ (स्वाहा) सत्यक्रिया से (घृतवद्भिः) घृतादि से युक्त (हव्यैः) होम के योग्य पदार्थों (च) और (इळाभिः) अन्नों के साथ (अग्नये) अग्नि के लिये (शतम्) सैकड़ों प्रकार के हविष्यों को (परि, दाशेम) सब ओर से देवें, वैसे (अमितैः) असंख्य (महोभिः) बड़े-बड़े कर्मों वा पुरुषों और (तेभिः) उन (आयसीभिः) लोहे से बनी (पूर्भिः) नगरियों के साथ वर्त्तमान (नः) हम लोगों को हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी प्रकाशमान् राजन् ! (नि, पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे ऋत्विक् और यजमान लोग घृतादि से अग्नि को बढ़ाते हैं, वैसे ही राजा प्रजाओं को और प्रजाएँ राजा को न्याय विनयादि से बढ़ा के अपरिमित सुखों को प्राप्त होते हैं ॥७॥