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Rigveda / 7 / 3 / 10

ए॒ता नो॑ अग्ने॒ सौभ॑गा दिदी॒ह्यपि॒ क्रतुं॑ सु॒चेत॑सं वतेम। विश्वा॑ स्तो॒तृभ्यो॑ गृण॒ते च॑ सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 3 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : राजा भी कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : ए॒ता। नः॒। अ॒ग्ने॒। सौभ॑गा। दि॒दी॒हि॒। अपि॑। क्रतु॑म्। सु॒ऽचेत॑सम्। व॒ते॒म॒। विश्वा॑। स्तो॒तृऽभ्यः॑। गृ॒ण॒ते। च॒। स॒न्तु॒। यू॒यम्। पा॒त॒। स्व॒स्तिऽभिः॑। सदा॑। नः॒ ॥१०॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् राजन् ! आप (नः) हमारे (एता) इन (सौभगा) उत्तम ऐश्वर्य्यों के भावों को (दिदीहि) प्रकाशित कीजिये जिससे (अपि) भी हम लोग (सुचेतसम्) प्रबल विद्यायुक्त (क्रतुम्) बुद्धि का (वतेम) सेवन करें (स्तोतृभ्यः) ऋत्विजों और (विश्वा) सब की (गृणते) स्तुति करनेवाले के लिये ये (च) भी सब प्राप्त (सन्तु) हों (यूयम्) हम लोग (स्वस्तिभिः) स्वस्थता करनेवाले सुखों वा कर्मों से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥१०॥

भावार्थ : हे राजन् ! आप सब मनुष्यों के सौभाग्यों को बढ़ा के बुद्धि को प्राप्त करो। हे प्रजापुरुषो ! आप लोग राजा और राज्य की सदैव रक्षा करो ॥१०॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१०॥ यह तृतीय सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥