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Rigveda / 7 / 5 / 5

त्वाम॑ग्ने ह॒रितो॑ वावशा॒ना गिरः॑ सचन्ते॒ धुन॑यो घृ॒ताचीः॑। पतिं॑ कृष्टी॒नां र॒थ्यं॑ रयी॒णां वै॑श्वान॒रमु॒षसां॑ के॒तुमह्ना॑म् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 5 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : स्वराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वाम्। अ॒ग्ने॒। ह॒रितः॑। वा॒व॒शा॒नाः। गिरः॑। स॒च॒न्ते॒। धुन॑यः। घृ॒ताचीः॑। पति॑म्। कृ॒ष्टी॒नाम्। र॒थ्य॑म्। र॒यी॒णाम्। वै॒श्वा॒न॒रम्। उ॒षसा॑म्। के॒तुम्। अह्ना॑म् ॥५॥

पदार्थ : हे (अग्ने) ज्ञानस्वरूप जगदीश्वर ! जिस (त्वाम्) आपको (हरितः) दिशा (वावशानाः) कामना के योग्य (गिरः) वाणी (धुनयः) वायु और (घृताचीः) रात्री (सचन्ते) सम्बन्ध करते हैं उस (रयीणाम्) धनों के (रथ्यम्) पहुँचानेवाले घोड़े के तुल्य रथों के हितकारी (उषसाम्) प्रभात वेलाओं के बीच (वैश्वानरम्) अग्नि के तुल्य प्रकाशित (अह्नाम्) दिनों के बीच (केतुम्) सूर्य के तुल्य (कृष्टीनाम्) मनुष्यों के (पतिम्) रक्षक स्वामी आपका हम लोग निरन्तर सेवन करें ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिस में सब दिशा, वेदवाणी, पवन और रात्री आदि काल के अवयव सम्बद्ध हैं, उसी समग्र ऐश्वर्य के देनेवाले सूर्य के तुल्य स्वयं प्रकाशित परमात्मा का नित्य ध्यान करो ॥५॥