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Rigveda / 1 / 44 / 3

अ॒द्या दू॒तं वृ॑णीमहे॒ वसु॑म॒ग्निं पु॑रुप्रि॒यम् । धू॒मके॑तुं॒ भाऋ॑जीकं॒ व्यु॑ष्टिषु य॒ज्ञाना॑मध्वर॒श्रिय॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 44 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदुपरिष्टाद् बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर कैसे मनुष्य को स्वीकार करे, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अ॒द्य । दू॒तम् । वृ॒णी॒म॒हे॒ । वसु॑म् । अ॒ग्निम् । पु॒रु॒ऽप्रि॒यम् । धू॒मऽके॑तुम् । भाःऽऋ॑जीकम् । विऽउ॑ष्टिषु । य॒ज्ञाना॑म् । अ॒ध्व॒र॒ऽश्रिय॑म्॥

पदार्थ : हम लोग (अद्य) आज मनुष्य जन्म वा विद्या के प्राप्ति समय को प्राप्त होकर (व्युष्टिषु) अनेक प्रकार की कामनाओं में (भाऋजीकम्) कामनाओं के प्रकाश (यज्ञानाम्) अग्निहोत्र आदि अश्वमेघ पर्यन्त वा योग उपासना ज्ञान शिल्पविद्यारूप यज्ञों के मध्य (अध्वरश्रियम्) अहिंसनीय यज्ञों की श्री शोभारूप (धूमकेतुम्) जिसका धूम ही ध्वजा है (वसुम्) सब विद्याओं का घर वा बहुत धन की प्राप्ति का हेतु (पुरुप्रियम्) बहुतों को प्रिय (दूतम्) पदार्थों को दूर पहुंचानेवाले (अग्निम्) भौतिक अग्नि के सदृश विद्वान् दूत को (वृणीमहे) अंगीकार करें ॥३॥

भावार्थ : मनुष्यों को उचित है कि विद्या वा राज्य की प्राप्ति के लिये सब विद्याओं के कथन करने वा सब बातों का उत्तर देनेवाले विद्वान् को दूत करें और बहुत गुणों के योग से बहुत कार्य्यों को प्राप्त करानेवाली बिजुली को स्वीकार करके सब कार्य्यों को सिद्ध करें ॥३॥