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Rigveda / 7 / 7 / 7

नू त्वाम॑ग्न ईमहे॒ वसि॑ष्ठा ईशा॒नं सू॑नो सहसो॒ वसू॑नाम्। इषं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घव॑द्भ्य आनड्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 7 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर कौन अच्छा, चतुर, अतिबलवान् तथा प्रशंसित होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : नु। त्वाम्। अ॒ग्ने॒। ई॒म॒हे॒। वसि॑ष्ठाः। ई॒शा॒नम्। सू॒नो॒ इति॑। स॒ह॒सः॒। वसू॑नाम्। इष॑म्। स्तो॒तृऽभ्यः॑। म॒घव॑त्ऽभ्यः। आ॒न॒ट्। यू॒यम्। पा॒त॒। स्व॒स्तिऽभिः॑। सदा॑। नः॒ ॥७॥

पदार्थ : हे (सहसः) अतिबलवान् के (सूनो) सत्पुत्र (अग्ने) विज्ञानस्वरूप ! (वसूनाम्) पृथिव्यादि तत्त्व साधनों के बीच (ईशानम्) समर्थ बलवान् (त्वाम्) आप को (वसिष्ठाः) अत्यन्त वसनेवाले हम लोग (ईमहे) याचना करते हैं (यूयम्) तुम लोग (स्तोतृभ्यः) सब विद्याओं की प्रशंसा करनेवाले (मघवद्भ्यः) बहुत धनयुक्त होने के लिये (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो। जो तुमको और (इषम्) अन्नादि को (नु) शीघ्र (आनट्) व्याप्त हो, उसकी तुम (स्वस्तिभिः) स्वस्थता करानेवाली क्रियाओं से सदा रक्षा करो ॥७॥

भावार्थ : जो विद्वानों के लिये धन देता है और विद्या की याचना करता है, जिसकी रक्षा आप्त करते हैं, वह सदा रक्षा को प्राप्त, बढ़ता हुआ सब ऐश्वर्य्य से युक्त होता है ॥७॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजादि के गुणों का वर्णन होने से सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह सातवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥