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Rigveda / 7 / 18 / 2

राजे॑व॒ हि जनि॑भिः॒ क्षेष्ये॒वाव॒ द्युभि॑र॒भि वि॒दुष्क॒विः सन्। पि॒शा गिरो॑ मघव॒न्गोभि॒रश्वै॑स्त्वाय॒तः शि॑शीहि रा॒ये अ॒स्मान् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 18 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : राजा॑ऽइव। हि। जनि॑ऽभिः। क्षेषि॑। ए॒व। अव॑। द्युऽभिः॑। अ॒भि। वि॒दुः। क॒विः। सन्। पि॒शा। गिरः॑। म॒घ॒ऽव॒न्। गोभिः॑। अश्वैः॑। त्वा॒ऽय॒तः। शि॒शी॒हि॒। रा॒ये। अ॒स्मान् ॥२॥

पदार्थ : हे (मघवन्) ऐश्वर्य्यवान् विद्वान् ! जो आप (जनिभिः) उत्पन्न हुई प्रजाओं से (राजेव) जैसे राजा जैसे (गोभिः) धेनु और (अश्वैः) घोड़ों से (राये) धन के लिये (त्वायतः) तुम्हारी कामना करते हुए (अस्मान्) हम लोगों को (शिशीहि) तेज बुद्धिवाले करो। जो (विदुः) विद्वान् (कविः) कविताई करने में चतुर (सन्) होते हुए (पिशा) रूप से (गिरः) वाणियों को तीक्ष्ण करो (द्युभिः) दिनों से (हि) ही (अभि, अव, क्षेषि) सब ओर से निरन्तर निवास करते हो (एव) उन्हीं आपको हम लोग निरन्तर उत्साहित करें ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे सूर्य सब पदार्थों के साथ प्रकाशित होता है, वैसे जो राजा प्रकाशमान हो और जो हम लोगों को सत्य के चाहनेवालों को प्रसन्न करता है, वह भी सदा प्रसन्न हो ॥२॥