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Rigveda / 7 / 18 / 16

अ॒र्धं वी॒रस्य॑ शृत॒पाम॑नि॒न्द्रं परा॒ शर्ध॑न्तं नुनुदे अ॒भि क्षाम्। इन्द्रो॑ म॒न्युं म॑न्यु॒म्यो॑ मिमाय भे॒जे प॒थो व॑र्त॒निं पत्य॑मानः ॥१६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 18 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒र्धम्। वी॒रस्य॑। शृ॒त॒ऽपाम्। अ॒नि॒न्द्रम्। परा॑। शर्ध॑न्तम्। नु॒नु॒दे॒। अ॒भि। क्षाम्। इन्द्रः। म॒न्युम्। म॒न्यु॒ऽम्यः॑। मि॒मा॒य॒। भे॒जे। प॒थः। व॒र्त॒निम्। पत्य॑मानः ॥१६॥

पदार्थ : जो (क्षाम्) भूमि को (पत्यमानः) पति के समान आचरण करता हुआ (इन्द्रः) ऐश्वर्ययुक्त शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाला (वीरस्य) शुभ गुणों में व्याप्त राजा (शृतपाम्) पके हुए दूध को पीने वा (अर्द्धम्) वर्षने वा (शर्धन्तम्) बल करनेवाले सेनापति को पाकर (अनिन्द्रम्) अनैश्वर्य को (पराणुनुदे) दूर करता है वा जो (मन्युम्यः) क्रोध को नष्ट करनेवाला शत्रुओं पर (मन्युम्) क्रोध को (अभि) सम्मुख से (मिमाय) मानता (पथः) वा मार्गों को और (वर्त्तनिम्) जिसमें वर्त्तमान होते हैं उस न्याय-मार्ग को (भेजे) सेवता है, वही राजजनों में श्रेष्ठ और राजराजेश्वर होता है ॥१६॥

भावार्थ : जो राजा वीर जनों की बल वृद्धि करके दुष्टों पर क्रोध करता और धार्मिकों पर आनन्ददृष्टि हो तथा न्याययुक्त मार्ग का अनुगामी होता हुआ ऐश्वर्य को पैदा करता है, वही सर्वदा वृद्धि को प्राप्त होता है ॥१६॥