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Rigveda / 1 / 44 / 14

शृ॒ण्वन्तु॒ स्तोमं॑ म॒रुतः॑ सु॒दान॑वोऽग्निजि॒ह्वा ऋ॑ता॒वृधः॑ । पिब॑तु॒ सोमं॒ वरु॑णो धृ॒तव्र॑तो॒ऽश्विभ्या॑मु॒षसा॑ स॒जूः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 44 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वे कैसे होवें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : शृ॒ण्वन्तु॑ । सोम॑म् । म॒रुतः॑ । सु॒ऽदान॑वः । अ॒ग्नि॒ऽजि॒ह्वाः । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । पिब॑तु । सोम॑म् । वरु॑णः । धृ॒तऽव्र॑तः । अ॒श्विऽभ्या॑म् । उ॒षसा॑ । स॒ऽजूः॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (अग्निजिह्वाः) जिनकी अग्नि के समान शब्द विद्या से प्रकाशित हुई जिह्वा है (ऋतावृधः) सत्य के बढ़ानेवाले (सुदानवः) उत्तम दानशील (मरुतः) विद्वानों ! तुम लोग हम लोगों के (स्तोमम्) स्तुति वा न्याय प्रकाश को (शृण्वन्तु) श्रवण करो, इसी प्रकार प्रतिजन (सजूः) तुल्य सेवने (वरुणः) श्रेष्ठ (धृतव्रतः) सत्य व्रत का धारण करनेहारे सब मनुष्यजन (उषसा) प्रभात (अश्विभ्याम्) व्याप्तिशील सभा सेना शाला धर्माध्यक्ष अध्वर्युओं के साथ (सोमम्) पदार्थविद्या से उत्पन्न हुए आनन्दरूपी रस को (पिबतु) पिओ ॥१४॥

भावार्थ : जो विद्या धर्म वा राजसभाओं से आज्ञा प्रकाशित हो सब मनुष्य उनका श्रवण तथा अनुष्ठान करें, जो सभासद् हों वे भी पक्षपात को छोड़कर प्रतिदिन सबके हित के लिये सब मिलकर जैसे अविद्या, अधर्म, अन्याय को नाश होवे वैसा यत्न करें ॥१४॥ इस सूक्त में धर्म की प्राप्ति दूत का करना सब विद्याओं का श्रवण उत्तम श्री की प्राप्ति श्रेष्ठ सङ्ग स्तुति और सत्कार पदार्थ विद्याओं सभाध्यक्ष दूत और यज्ञ का अनुष्ठान मित्रादिकों का ग्रहण परस्पर मिलकर सब कार्य्यों की सिद्धि उत्तम व्यवहारों में स्थिति परस्पर विद्या धर्म राजसभाओं को सुनकर अनुष्ठान करना कहा है इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। यह तीसवां वर्ग और चवालीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३०॥४४॥