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Rigveda / 7 / 20 / 7

यदि॑न्द्र॒ पूर्वो॒ अप॑राय॒ शिक्ष॒न्नय॒ज्ज्याया॒न्कनी॑यसो दे॒ष्णम्। अ॒मृत॒ इत्पर्या॑सीत दू॒रमा चि॑त्र॒ चित्र्यं॑ भरा र॒यिं नः॑ ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 20 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर विद्वान् अन्य जनों के प्रति कैसे उपकारी हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यत्। इ॒न्द्र॒। पूर्वः॑। अप॑राय। शि॒क्ष॒न्। अय॑त्। ज्याया॑न्। कनी॑यसः। दे॒ष्णम्। अ॒मृतः॑। इत्। परि॑। आ॒सी॒त॒। दू॒रम्। आ। चि॒त्र॒। चित्र्य॑म्। भ॒र॒। र॒यिम्। नः॒ ॥७॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमैश्वर्य के देनेवाले (यत्) जो (पूर्वः) प्रथम (अपराय) और के लिये (ज्यायान्) अतीव वृद्ध वा श्रेष्ठ जन (कनीयसः) अत्यन्त कनिष्ठ से (देष्णम्) देने योग्य की (शिक्षन्) शिक्षा अर्थात् विद्या ग्रहण कराता हुआ (अयत्) प्राप्त होता वा हे (चित्र) अद्भुत कर्म करनेवाले ! जो (अमृतः, इत्) नाशरहित ही आत्मा से नित्य योगी (दूरम्) दूर (पर्यासीत) सब ओर से स्थित हो उसके साथ आप (नः) हम लोगों के लिये (चित्र्यम्) अद्भुत-अद्भुत कर्मों में हुए (रयिम्) धन को (आ, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥७॥

भावार्थ : हे राजा ! जो पहिले विद्वान् होकर विद्यार्थियों को शिक्षा देते हैं वा जो ज्येष्ठ कनिष्ठों के प्रति पिता के समान वर्त्ताव रखते हैं वा जो योगी जन परमात्मा को समाधि से अपने आत्मा में अच्छे प्रकार आरोप के औरों को उपदेश देते हैं, उनके लिये तुम शरीर, मन और धन को धारण करो ॥७॥