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Rigveda / 7 / 21 / 2

प्र य॑न्ति य॒ज्ञं वि॒पय॑न्ति ब॒र्हिः सो॑म॒मादो॑ वि॒दथे॑ दु॒ध्रवा॑चः। न्यु॑ भ्रियन्ते य॒शसो॑ गृ॒भादा दू॒रउ॑पब्दो॒ वृष॑णो नृ॒षाचः॑ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 21 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। य॒न्ति॒। य॒ज्ञम्। वि॒पय॑न्ति। ब॒र्हिः। सो॒म॒ऽमादः॑। वि॒दथे॑। दु॒ध्रऽवा॑चः। नि। ऊँ॒ इति॑। भ्रि॒य॒न्ते॒। य॒शसः॑। गृ॒भात्। आ। दू॒रेऽउ॑पब्दः। वृष॑णः। नृ॒ऽसाचः॑ ॥२॥

पदार्थ : जो (सोममादः) सोम से हर्षित होते (दुध्रवाचः) वा जिनकी दुःख से धारण करने योग्य वाणी (वृषणः) वे बलिष्ठ (नृषाचः) नायक मनुष्यों से सम्बन्ध करनेवाले जन (यज्ञम्) विद्वानों के सङ्ग आदि को (प्र, यन्ति) प्राप्त होते हैं (विदथे) संग्राम में (बर्हिः) अन्तरिक्ष में (विपयन्ति) विशेषता से जाते हैं (उ) और जो (यशसः) कीर्ति से वा (गृभात्) घर से (आ, भ्रियन्ते) अच्छे प्रकार उत्तमता को धारण करते हैं तथा (दूरउपब्दः) जिनकी दूर वाणी पहुँचती वे सज्जन (नि) निरन्तर उत्तमता को धारण करते हैं और वे विजय को प्राप्त होते हैं ॥२॥

भावार्थ : जैसे यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाले आनन्द को प्राप्त होते हैं, वैसे युद्ध में निपुण पुरुष विजय को प्राप्त होते हैं, जैसे दूरदेशों में कीर्ति रखनेवाला विद्वान् जन होता है, वैसे यश से संचय किये कर्मों को कर परोपकारी जन हों ॥२॥