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Rigveda / 7 / 21 / 4

भी॒मो वि॑वे॒षायु॑धेभिरेषा॒मपां॑सि॒ विश्वा॒ नर्या॑णि वि॒द्वान्। इन्द्रः॒ पुरो॒ जर्हृ॑षाणो॒ वि दू॑धो॒द्वि वज्र॑हस्तो महि॒ना ज॑घान ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 21 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह सेनापति क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : भी॒मः। वि॒वे॒ष॒। आयु॑धेभिः। ए॒षा॒म्। अपां॑सि। विश्वा॑। नर्या॑णि। वि॒द्वान्। इन्द्रः॑। पुरः॑। जर्हृ॑षाणः। वि। दू॒धो॒त्। वि। वज्र॑ऽहस्तः। म॒हि॒ना। ज॒घा॒न॒ ॥४॥

पदार्थ : जो (भीमः) भय करने वा (वज्रहस्तः) शस्त्र और अस्त्र हाथों में रखनेवाला (जर्हृषाणः) निरन्तर आनन्दित (विद्वान्) विद्वान् (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (आयुधेभिः) युद्ध सिद्धि करानेवाले शस्त्रों से (महिना) बड़प्पन के साथ (एषाम्) इन शत्रुओं के (विश्वा) समस्त (नर्याणि) मनुष्यों के हित करनेवाले (अपांसि) कर्मों को (विवेष) व्याप्त हो (पुरः) शत्रुओं की नगरियों को (वि, दूधोत्) कंपावे शत्रुओं को (वि, जघान) मारे, वही सेनापति होने योग्य होता है ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो युद्ध कार्यों को समग्र जान अपनी सेना को युद्ध में निपुण कर शत्रुओं को कंपा और शत्रुसेनाओं को कंपाते हैं, वे विजय से शोभित होते हैं ॥४॥