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Rigveda / 7 / 25 / 3

श॒तं ते॑ शिप्रिन्नू॒तयः॑ सु॒दासे॑ स॒हस्रं॒ शंसा॑ उ॒त रा॒तिर॑स्तु। ज॒हि वध॑र्व॒नुषो॒ मर्त्य॑स्या॒स्मे द्यु॒म्नमधि॒ रत्नं॑ च धेहि ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 25 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : श॒तम्। ते॒। शि॒प्रि॒न्। ऊ॒तयः॑। सु॒ऽदासे॑। स॒हस्र॑म्। शंसाः॑। उ॒त। रा॒तिः। अ॒स्तु॒। ज॒हि। वधः॑। व॒नुषः॑। मर्त्य॑स्य। अ॒स्मे इति॑। द्यु॒म्नम्। अधि॑। रत्न॑म्। च॒। धे॒हि॒ ॥३॥

पदार्थ : हे (शिप्रिन्) अच्छे मुखवाले राजा ! (ते) आपके (वनुषः) याचना करते हुए पीड़ित मनुष्य की (शतम्) सैकड़ों (ऊतयः) रक्षा आदि क्रिया और (सहस्रम्) असंख्य (शंसाः) प्रशंसा हों (उत) और (सुदासे) जो उत्तमता से देता है उसके लिये (रातिः) दान (अस्तु) हो आप (वनुषः) अधर्म से माँगनेवाले पाखण्डी (मर्त्यस्य) मनुष्य की (वधः) ताड़ना को (जहि) हनो, नष्ट करो तथा (अस्मे) हम लोगों में (द्युम्नम्) धर्मयुक्त यश और (रत्नं च) रमणीय धन भी (अधि, धेहि) अधिकता से धारण करो ॥३॥

भावार्थ : हे राजा ! आप सैकड़ों वा सहस्रों प्रकारों से प्रजा की पालना और सुपात्रों को देना, दुष्टों का बन्धन, प्रजाजनों में कीर्ति बढ़ाना और धन को निरन्तर विधान करो, जिससे सब सुखी हों ॥३॥