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Rigveda / 1 / 45 / 7

नि त्वा॒ होता॑रमृ॒त्विजं॑ दधि॒रे व॑सु॒वित्त॑मम् । श्रुत्क॑र्णं स॒प्रथ॑स्तमं॒ विप्रा॑ अग्ने॒ दिवि॑ष्टिषु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 45 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अग्निर्देवाः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उस को किस प्रकार जानकर धारण करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : नि । त्वा॒ । होता॑रम् । ऋ॒त्विज॑म् । द॒धि॒रे । व॒सु॒वित्ऽत॑मम् । श्रुत्ऽक॑र्णम् । स॒प्रथः॑ऽतमम् । विप्राः॑ । अ॒ग्ने॒ । दिवि॑ष्टिषु॥

पदार्थ : हे (अग्ने) बहुश्रुत सत्पुरुष ! जो (विप्राः) मेधावी विद्वान् लोग (दिविष्टिषु) पवित्र पठन पाठनरूप क्रियाओं में अग्नि के तुल्य जिस (होतारम्) ग्रहण कारक (ऋत्विजम्) ऋतुओं को संगत करने (श्रुत्कर्णम्) सब विद्याओं को सुनने (सप्रथस्तमम्) अत्यन्त विस्तार के साथ वर्त्तने (वसुवित्तमम्) पदार्थों को ठीक-२ जाननेवाले (त्वा) तुझको (निदधिरे) धारण करते हैं उनको तू भी धारण कर ॥७॥

भावार्थ : जो मनुष्य उत्तम कार्य सिद्धि के लिये प्रयत्न करते और चक्रवर्त्ती राज्य श्री और विद्याधन की सिद्धि करने को समर्थ हो सकते हैं वे शोक को प्राप्त नहीं होते ॥७॥