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Rigveda / 7 / 31 / 9

ऊ॒र्ध्वास॒स्त्वान्विन्द॑वो॒ भुव॑न्द॒स्ममुप॒ द्यवि॑। सं ते॑ नमन्त कृ॒ष्टयः॑ ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 31 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर किस मनुष्य को सब नमते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : ऊ॒र्ध्वासः॑। त्वा॒। अनु॑। इन्द॑वः। भुव॑न्। द॒स्मम्। उप॑। द्यवि॑। सम्। ते॒। न॒म॒न्त॒। कृ॒ष्टयः॑ ॥९॥

पदार्थ : हे विद्वान् ! जो (ऊर्ध्वासः) उत्कृष्ट (इन्दवः) ऐश्वर्ययुक्त आनन्दित (अनु, भुवन्) अनुकूल होते हैं (ते) वे (कृष्टयः) मनुष्य (उपद्यवि) समीपस्थ प्रकाशित वा अप्रकाशित विषय में (दस्मम्) शत्रुओं का उपक्षय विनाश करने (त्वा) आपको (सम्, नमन्त) अच्छे प्रकार नमते हैं ॥९॥

भावार्थ : जिस राजा के समीप में भद्र, धार्मिक जन हैं, उसकी नम्रता से सब प्रजा नम्र होती है ॥९॥