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Rigveda / 7 / 32 / 1

मो षु त्वा॑ वा॒घत॑श्च॒नारे अ॒स्मन्नि री॑रमन्। आ॒रात्ता॑च्चित्सध॒मादं॑ न॒ आ ग॑ही॒ह वा॒ सन्नुप॑ श्रुधि ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 32 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब सत्ताईस ऋचावाले बत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कौन दूर और समीप में रक्षा करने योग्य होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : मो इति॑। सु। त्वा॒। वा॒घतः॑। च॒न। आ॒रे। अ॒स्मत्। नि। री॒र॒म॒न्। आ॒रात्ता॑त्। चि॒त्। स॒ध॒ऽमाद॑म्। नः॒। आ। ग॒हि॒। इ॒ह। वा॒। सन्। उप॑। श्रु॒धि॒ ॥१॥

पदार्थ : हे विद्वान् राजा ! (वाघतः) मेधावी जन आपके (आरे) दूर (चन) और (अस्मत्) हम से दूर (मो, सु, रीरमन्) मत रमें। निरन्तर आपके समीप होते हुए (त्वा) आपको रमावें। (आरात्तात्) दूर में (चित्) भी आप (नः) हमारे (सधमादम्) उस स्थान को कि जिसमें एक साथ आनन्द करते हैं (आ, गहि) आओ (इह, वा) यहाँ प्रसन्न (सन्) होते हुए हमारे वचनों को (नि, उप, श्रुधि) समीप में सुनो ॥१॥

भावार्थ : जिन मनुष्यों के समीप बुद्धिमान् धार्मिक, विद्वान्जन और दूर में दुष्ट जन हैं, वे सदैव सुख पाते हैं ॥१॥