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Rigveda / 7 / 32 / 7

भवा॒ वरू॑थं मघवन्म॒घोनां॒ यत्स॒मजा॑सि॒ शर्ध॑तः। वि त्वाह॑तस्य॒ वेद॑नं भजेम॒ह्या दू॒णाशो॑ भरा॒ गय॑म् ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 32 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : भव॑। वरू॑थम्। म॒घ॒ऽव॒न्। म॒घोना॑म्। यत्। स॒म्ऽअजा॑सि। शर्ध॑तः। वि। त्वाऽह॑तस्य। वेद॑नम्। भ॒जे॒म॒हि॒। आ। दुः॒ऽनशः॑। भ॒र॒। गय॑म् ॥७॥

पदार्थ : हे (मघवन्) बहुधनयुक्त राजा ! आप (यत्) जो (मघोनाम्) धनवानों का (वरूथम्) प्रशंसित घर है उसे (समजासि) अच्छे प्राप्त होओ (त्वाहतस्य) तुम्हारे नष्ट किये हुए (शर्धतः) बलवान् के घर को प्राप्त (भव) होओ बलवान् के (गयम्) प्रजाजनों को (भर) धारण पोषण करो और (दूणाशः) दुर्लभ है नाश जिसका ऐसे होते हुए (वि) विशेषता से प्रसिद्ध हूजिये जिससे (वेदनम्) पदार्थों की प्राप्ति को हम लोग (आ, भजेमहि) अच्छे सेवें ॥७॥

भावार्थ : हे राजा ! दुष्टों के मारनेवाले आपकी प्रजा में जो नीति उसी के अनुकूल कर्म हम लोग करें, जिससे हमारे अनुकूल आप होओ ॥७॥