Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 32 / 11

गम॒द्वाजं॑ वा॒जय॑न्निन्द्र॒ मर्त्यो॒ यस्य॒ त्वम॑वि॒ता भुवः॑। अ॒स्माकं॑ बोध्यवि॒ता रथा॑नाम॒स्माकं॑ शूर नृ॒णाम् ॥११॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 32 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर राजा और प्रजाजन परस्पर क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : गम॑त्। वाज॑म्। वा॒जय॑न्। इ॒न्द्र॒। मर्त्यः॑। यस्य॑। त्वम्। अ॒वि॒ता। भुवः॑। अ॒स्माक॑म्। बो॒धि॒। अ॒वि॒ता। रथा॑नाम्। अ॒स्माक॑म्। शू॒र॒। नृ॒णाम् ॥११॥

पदार्थ : हे (शूर) निर्भय (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त राजा ! (यस्य) जिसके आप (अविता) रक्षक (भुवः) हों वह (मर्त्यः) मनुष्य (वाजयन्) पाने की इच्छा करता हुआ (वाजम्) विज्ञान वा अन्नादि को (गमत्) प्राप्त होता है जिन (अस्माकम्) हम लोगों के (रथानाम्) रथ आदि के तथा जिन (अस्माकम्) हम लोगों के (नृणाम्) मनुष्यों के भी (अविता) रक्षा करनेवाले (त्वम्) आप (बोधि) समझें वे हम लोग विज्ञान वा अन्न आदि को प्राप्त हों ॥११॥

भावार्थ : जब राजा प्रजाओं की और प्रजाजन राजाओं की रक्षा करें, तब सब की यथावत् रक्षा का संभव हो ॥११॥