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Rigveda / 7 / 32 / 19

शिक्षे॑य॒मिन्म॑हय॒ते दि॒वेदि॑वे रा॒य आ कु॑हचि॒द्विदे॑। न॒हि त्वद॒न्यन्म॑घवन्न॒ आप्यं॒ वस्यो॒ अस्ति॑ पि॒ता च॒न ॥१९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 32 | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर प्रजाजनों को क्या चाहने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : शिक्षे॑यम्। इत्। म॒ह॒ऽय॒ते। दि॒वेऽदि॑वे। रा॒यः। आ। कु॒ह॒चि॒त्ऽविदे॑। नहि। त्वत्। अ॒न्यत्। म॒घ॒ऽव॒न्। नः॒। आप्य॑म्। वस्यः॑। अस्ति॑। पि॒ता। च॒न ॥१९॥

पदार्थ : हे (मघवन्) पूजित धनयुक्त परमैश्वर्य्यवान् ! जो मैं (दिवेदिवे) प्रकाश प्रकाश के लिये (आ, कुहचिद्विदे) जो कहीं भी प्राप्त होता उस (महयते) महान् (राये) धन के लिये (शिक्षेयम्) अच्छी शिक्षा करूँ (त्वत्) तुम से (अन्यत्) और रक्षक को न जानूँ जो आप (पिता) पिता रक्षा करनेवाले (चन) भी हैं इस कारण सो आप (इत्) ही (नः) हमारे (वस्यः) अत्यन्त वश (आप्यम्) प्राप्त होने के योग्य हैं और (नहि) नहीं (अस्ति) है ॥१९॥

भावार्थ : वे ही भृत्य उत्तम हैं, जो राजा वा स्वामी को छोड़ के दूसरे को [=से] नहीं जांचते [=माँगते] न विना दिये लेते, प्रतिदिन पुरुषार्थ से प्रजा की रक्षा कर और धनवृद्धि करना चाहते हैं ॥१९॥