Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 32 / 23

न त्वावाँ॑ अ॒न्यो दि॒व्यो न पार्थि॑वो॒ न जा॒तो न ज॑निष्यते। अ॒श्वा॒यन्तो॑ मघवन्निन्द्र वा॒जिनो॑ ग॒व्यन्त॑स्त्वा हवामहे ॥२३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 32 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : परमेश्वर के तुल्य वा अधिक कोई नहीं है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : न। त्वाऽवा॑न्। अ॒न्यः। दि॒व्यः। न। पार्थि॑वः। न। जा॒तः। न। ज॒नि॒ष्य॒ते॒। अ॒श्व॒ऽयन्तः॑। म॒घ॒ऽव॒न्। इ॒न्द्र॒। वा॒जिनः॑। ग॒व्यन्तः॑। त्वा॒। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥२३॥

पदार्थ : हे (मघवन्) बहुधनयुक्त (इन्द्र) परम ऐश्वर्य देनेवाले जगदीश्वर ! जिससे कोई पदार्थ (न) न (त्वावान्) आपके सदृश (अन्यः) और (दिव्यः) शुद्धस्वरूप पदार्थ है (न) न (पार्थिवः) पृथिवी पर जाना हुआ है (न) न (जातः) उत्पन्न हुआ है (न) न (जनिष्यते) उत्पन्न होगा इससे (त्वा) आपकी (अश्वायन्तः) महान् विद्वानों की कामना करनेवाले (वाजिनः) विज्ञान और अन्नवाले और (गव्यन्तः) अपने को उत्तम वाणी वा उत्तम भूमि की इच्छा करनेवाले हम लोग (हवामहे) प्रशंसा करते हैं ॥२३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिस कारण परमेश्वर से तुल्य अधिक अन्य पदार्थ कोई नहीं न उत्पन्न हुआ न कभी भी उत्पन्न होगा, इससे ही उसकी उपासना और प्रशंसा हम लोग नित्य करें ॥२३॥