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Rigveda / 7 / 37 / 7

अ॒भि यं दे॒वी निर्ऋ॑तिश्चि॒दीशे॒ नक्ष॑न्त॒ इन्द्रं॑ श॒रदः॑ सु॒पृक्षः॑। उप॑ त्रिब॒न्धुर्ज॒रद॑ष्टिमे॒त्यस्व॑वेशं॒ यं कृ॒णव॑न्त॒ मर्ताः॑ ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 37 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒भि। यम्। दे॒वी। निःऽऋ॑तिः। चि॒त्। ईशे॑। नक्ष॑न्ते। इन्द्र॑म्। श॒रदः॑। सु॒ऽपृक्षः॑। उप॑। त्रि॒ऽब॒न्धुः॒। ज॒रत्ऽअ॑ष्टिम्। ए॒ति॒। अस्व॑वेशम्। यम्। कृ॒णव॑न्त। मर्ताः॑ ॥७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (यम्) जिस पदार्थ को (निर्ऋतिः) भूमि (चित्) वैसे (देवी) विदुषी स्त्री उसको (अभि, एति) सब ओर से प्राप्त होती वा (सुपृक्षः) जो सुन्दर अन्नवाला (त्रिबन्धुः) तीन जनों का बन्धु जिस (जरदिष्टम्) वृद्धावस्था को (ईशे) ऐश्वर्ययुक्त करता है जिस (इन्द्रम्) सूर्य को (शरदः) शरद् आदि ऋतु (नक्षन्ते) व्याप्त होती हैं जिस (अस्ववेशम्) अपने रूप को न धारण किये हुए का (मर्ताः) मनुष्य (उप, कृणवन्त) उपकार करते हैं, उन सब का हम भी उपकार करें ॥७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! तुम जैसे शरीर वाणी और मन से उत्पन्न हुए तीन प्रकार के सुख को प्राप्त विद्वान् जन हृदय से चाही हुई भार्या को प्राप्त होता है, स्त्री भी प्रिय पति को प्राप्त होकर आनन्दित होती वा जैसे ऋतु अपने-अपने समय को प्राप्त होकर सबको आनन्दित करती वा जैसे स्वभाव से ही कौमार आदि अवस्था आती हैं, वैसे ही परस्पर में प्रीति कर प्रयत्न करो ॥७॥