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Rigveda / 7 / 38 / 7

शं नो॑ भवन्तु वा॒जिनो॒ हवे॑षु दे॒वता॑ता मि॒तद्र॑वः स्व॒र्काः। ज॒म्भय॒न्तोऽहिं॒ वृकं॒ रक्षां॑सि॒ सने॑म्य॒स्मद्यु॑यव॒न्नमी॑वाः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 38 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : वाजिनः | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर कौन इस संसार में कल्याण करनेवाले होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : शम्। नः॒। भ॒व॒न्तु॒। वा॒जिनः॑। हवे॑षु। दे॒वऽता॑ता। मि॒तऽद्र॑वः। सु॒ऽअ॒र्काः। ज॒म्भय॑न्तः। अहि॑म्। वृक॑म्। रक्षां॑सि। सऽने॑मि। अ॒स्मत्। यु॒य॒व॒न्। अमी॑वाः ॥७॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! (वाजिनः) वेगवान् घोड़ा वा ज्ञानवान् योद्धा पुरुष (मितद्रवः) जो प्रमाण भर जाते हैं (स्वर्काः) जिन का शुभ अन्नादि है (हवेषु) वे संग्रामों में (देवताता) वा विद्वानों के अनुष्ठान करने योग्य यज्ञ में (अहिम्) सर्प के समान वर्तमान (वृकम्) चोर को और (रक्षांसि) दुष्ट प्राणियों को (जम्भयन्तः) जम्भाई दिलाते हुए (नः) हम लोगों को (शम्) सुख के लिये (भवन्तु) होवें जिस से (अस्मत्) हम लोगों से (सनेमि) पुराने व्यवहार में (अमीवाः) रोग (युयवन्) अलग हों ॥७॥

भावार्थ : जो दुष्ट आचारवाले प्राणी, रोग और शत्रुओं को निवार के सब के सुख करनेवाले होते हैं, वे ही जगत् पूज्य होते हैं ॥७॥