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Rigveda / 1 / 46 / 11

अभू॑दु पा॒रमेत॑वे॒ पन्था॑ ऋ॒तस्य॑ साधु॒या । अद॑र्शि॒ वि स्रु॒तिर्दि॒वः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 46 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी उत्तर का उपदेश अगले मन्त्र में करते हैं०।

पदपाठ : अभू॑त् । ऊँ॒ इति॑ । पा॒रम् । एत॑वे । पन्था॑ । ऋ॒तस्य॑ । सा॒धु॒ऽया । अद॑र्शि । वि । स्रु॒तिः । दि॒वः॥

पदार्थ : मनुष्यों को योग्य है कि समुद्रादि के (पारम्) पार (एतवे) जाने के लिये जहां (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य और (ऋतस्य) जल का (विस्रुतिः) अनेक प्रकार गमनार्थ (पन्थाः) मार्ग (अभूत्) हो वहां स्थिर होके (साधुया) उत्तम सवारी से सुखपूर्वक देश देशान्तरों को (अदर्शि) देखें तो श्रीमन्त क्यों न होवें ॥११॥

भावार्थ : मनुष्यों को उचित हैं कि सर्वत्र आने जाने के लिये सीधे और शुद्ध मार्गों को रच और विमानादि यानों से इच्छापूर्वक गमन करके नाना प्रकार के सुखों को प्राप्त करें ॥११॥