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Rigveda / 7 / 41 / 4

उ॒तेदानीं॒ भग॑वन्तः स्यामो॒त प्र॑पि॒त्व उ॒त मध्ये॒ अह्ना॑म्। उ॒तोदि॑ता मघव॒न्त्सूर्य॑स्य व॒यं दे॒वानां॑ सुम॒तौ स्या॑म ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 41 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : भगः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्यों को किससे कैसा होना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उत॑। इ॒दानी॑म्। भग॑ऽवन्तः। स्या॒म॒। उ॒त। प्र॒ऽपि॒त्वे। उ॒त। मध्ये॑। अह्ना॑म्। उ॒त। उत्ऽइ॑ता। म॒घ॒ऽव॒न्। सूर्य॑स्य। व॒यम्। दे॒वाना॑म्। सु॒ऽम॒तौ। स्या॒म॒ ॥४॥

पदार्थ : हे (मघवन्) परमपूजित ऐश्वर्य्य युक्त जगदीश्वर ! (इदानीम्) इस समय (उत) और (प्रपित्वे) उत्तमता से ऐश्वर्य्य की प्राप्ति समय में (उत) और (अह्नाम्) दिनों में (मध्ये) बीच (उत) और (सूर्यस्य) सूर्य लोक के (उदिता) उदय में (उत) और सायंकाल में (भगवन्तः) बहुत उत्तम ऐश्वर्ययुक्त (वयम्) हम लोग (स्याम) हों (देवानाम्) तथा आप्तविद्वानों की (सुमतौ) श्रेष्ठ मति में स्थिर हों ॥४॥

भावार्थ : जो मनुष्य जगदीश्वर का आश्रय और आज्ञा पालन से विद्वानों के सङ्ग से अति पुरुषार्थी होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के लिये प्रयत्न करते हैं, वे सकलैश्वर्य युक्त होते हुए भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान इन तीनों कालों में सुखी होते हैं ॥४॥