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Rigveda / 7 / 44 / 4

द॒धि॒क्रावा॑ प्रथ॒मो वा॒ज्यर्वाग्रे॒ रथा॑नां भवति प्रजा॒नन्। सं॒वि॒दा॒न उ॒षसा॒ सूर्ये॑णादि॒त्येभि॒र्वसु॑भि॒रङ्गि॑रोभिः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 44 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : लिङ्गोक्ताः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर विद्वान् जन क्या जान कर क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : द॒धि॒ऽक्रावा॑। प्र॒थ॒मः। वा॒जी। अर्वा॑। अग्रे॑। रथा॑नाम्। भ॒व॒ति॒। प्र॒ऽजा॒नन्। स॒म्ऽवि॒दा॒नः। उ॒षसा॑। सूर्ये॑ण। आ॒दि॒त्येभिः॑। वसु॑ऽभिः। अङ्गि॑रःऽभिः ॥४॥

पदार्थ : जो (दधिक्रावा) धारण करनेवालों को पहुँचाने और (प्रथमः) प्रथम सिद्ध करनेवाला (वाजी) वेगवान् (अर्वा) प्रेरणा को प्राप्त अग्नि (उषसा) प्रातःकाल की बेला (सूर्येण) सूर्यलोक (आदित्येभिः) संवत्सर के महीनों (वसुभिः) पृथिवी आदि लोकों और (अङ्गिरोभिः) पवनों के सहित होता हुआ (रथनाम्) रमणीय यानों के (अग्रे) आगे बहानेवाला (भवति) होता है उसको (प्रजानन्) उत्तमता से जानता और (संविदानः) अच्छे प्रकार उसका विज्ञान करता हुआ विद्वान् जन अच्छा प्रयोग करे ॥४॥

भावार्थ : जो अग्निविद्या को जानते हैं, वे रथों के शीघ्र चलानेवाले होते हैं ॥४॥