Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 48 / 1

ऋभु॑क्षणो वाजा मा॒दय॑ध्वम॒स्मे न॑रो मघवानः सु॒तस्य॑। आ वो॒ऽर्वाचः॒ क्रत॑वो॒ न या॒तां विभ्वो॒ रथं॒ नर्यं॑ वर्तयन्तु ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 48 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : ऋभवः | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब चार ऋचावाले अड़तालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ऋभु॑ऽक्षणः। वा॒जाः॒। मा॒दय॑ध्वम्। अ॒स्मे इति॑। न॒रः॒। म॒घ॒ऽवा॒नः॒। सु॒तस्य॑। आ। वः॒। अ॒र्वाचः॑। क्रत॑वः। न। या॒ताम्। विऽभ्वः॑। रथ॑म्। नर्य॑म्। व॒र्त॒य॒न्तु॒ ॥१॥

पदार्थ : हे (ऋभुक्षणः) महात्मा (मघवानः) बहुत उत्तम धनयुक्त (विभ्वः) सकल विद्याओं में व्याप्त (अर्वाचः) जो पीछे जानेवाले (वाजाः) विज्ञानवान् (नरः) मनुष्यो ! तुम (क्रतवः) अतीव बुद्धियों के (न) समान (सुतस्य) उत्पन्न हुए के सेवने से (अस्मे) हम लोगों को (मादयध्वम्) आनन्दित करो (आ, याताम्) आते हुए (वः) तुम लोगों के और हमारे (नर्यम्) मनुष्यों में उत्तम (रथम्) रमणीय यान को और नर (वर्तयन्तु) वर्तें ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन तुम्हें और हमें विद्या और बुद्धि के दान से वा शिल्पविद्या से आनन्दित करते हैं, वे सर्वदा प्रशंसा करने योग्य हैं ॥१॥